जरा हटके

दिल की दिवाली, एक प्यारा-सा सन्देश

Essay on Diwali in

Hindi दिल की दिवाली

दोस्तों, दिवाली खुशियाँ, उमंग, उत्साह, उम्मीदों तथा प्रकाश का त्यौहार हैं ।
MJC की तरफ से आप सभी को दिपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ …..।
आप सभी अपने-अपने घरों में साफसफाई को लेकर काफी व्यस्त होगें । या फिर हम ऐसे भी कहँ सकतें हैं कि दिवाली Municipality का कार्य करती हैं । हम हर बार दिवाली एक जैसी ही मनाते आ रहें हैं. क्या आप यह नहीं जानना चाहेगें कि आप सदियों पुरानी परंपरा को तो मनाते आ रहें हैं लेकिन ऐसी क्या चीजें हैं जिन्हें हमे नहीं करना चाहिए वो भी जाने-अंजाने करते चले जा रहें हैं ?
     

हम दिपावली पर क्या

करें और क्या न करें ?

 सबसे पहले हम जानेगें

कि क्या करें ?

सफाई करें

वैसे तो आप अपने घरो में  पेटं का काम कभी भी करवा सकतें हैं परन्तु यदि दिवालीं नजदीक हो तो घरों की रगांईपुताई दिवाली पर ही करना उचित होता हैं क्योकि यह सब करनें के दो कारण है. एक तो घरो में पेटं करने से चमक आ जाती हैं तथा दुसरा बरसात के बाद जो घरो में गदंगी के माध्यम से रोग उत्पन्न होने का खतरा होता हैं ….वह खत्म हो जाता है.

मिट्टी के दिपक जलायें

दिवाली रोशनी का त्यौहार माना जाता हैं …इसलिए आप मिट्टी के दीपों का इस्तेमाल अधिक से अधिक करें …ऐसा इसलिए क्योकि मिट्टी के दिप जलाने से सकारात्मक तथा चुम्बकीय ऊर्जा निकलती हैं….जो आँख और मन दोनों के लिए लाभदायक होती हैं ।
आपकों याद हो तो बचपन में आपकी माँ ने मिट्टी के दीयें में सरसों का तेल डालकर किसी एक बर्तन पर काजल बनाकर लगाया होगा ।
मिट्टी के दीपक अगर आप खरीदेगें तो किसी गरीब के घर में खुशियों की रोशनी फेलेगी. मिट्टी के दीयें फूटने के बाद Destroy भी हो जाते हैं. 

कानों में सरसों का तेल डालने की परंपरा

कानों में सरसों का तेल डालने की प्रथा होती हैं ।यह बहुत ही शुभ माना जाता हैं. कानों में तेल डालने के पीछे का कारण तो नहीं पता लेकिन इतना जरूर हैं कि इससे कानों के अंदर संक्रमण नहीं फेलता हैैं. तेल को हल्का गर्म करके डाला जाता हैं.

सहायता करें

हम हर बार कम से कम पाँच सौ से लेकर हजार रूपयें के पटाखे चला देते हैं. इससे दस गुना ज्यादा पैसे जुयें में गवा देते हैं लेकिन कभी भी हम उनके बारें नहीं सोचतें, जों इस त्योहार से महरूम रह जातें हैं. उनके लिए त्यौहार कोई नई बात नहीं होती. उनका दिन रो के दिनों की तरह साधारण ही होता हैं.
मैं बात कर रहा हूँ उन लोगों की जो बेसहारा हैं. आप पटाखें की जगह इनकी मदद भी कर सकतें हैं. आपके खरीदें हुए पटाखें मिस हो सकतें हैं लेकिन इनकी दुआएँ कभी मिस नहीं होगी. आप एक बार साहयता करकें तो देखियें.
तो चलिए इस बार से दिवाली में आपको क्या नहीं करना चाहिएआप इस पाँस्ट को पूरा पढ़े ताकि आप कुछ इस बार नया कर पायें. आप इन बातों को अपनायेगें ऐसी मुझे आपसे आशा हैं.

पटाखे बिल्कुल न चलायें

कुछ लोगों को इस बात से कड़ा ऐतराज हो सकता हैं. लेकिन जो चीज नुकसानदेह हैं उससे हमारे त्यौहार की रौनक कैसे बढ़ सकती हैं.
हम प्रभू श्री राम के अयोध्या वापस आने के उपलंक्ष में दिपावली का त्यौहार मनाते हैं. तो क्या तब भी अयोध्या वासीयों ने प्रभू श्री राम के आने पर पटाखें चलायें होगें ? नहीं ना, तो फिर हम ऐसी कुप्रथाओं को जन्म क्यों दें रहें हैं  जिससे प्रदूषण को बढ़ावा मिलता हैं ? आस-पास के जानवरो को सांस लेने में दिक्कत होती हैं. बुजर्गो व बच्चों को अधिक ध्वनि वाले पटाखे कई प्रकार की समस्याएँ पैदा करते हैं.
दिल्ली हाईकोर्ट को हर बार दिवाली पर अपनी Guide line जारी करनी पड़ती हैं…..ऐसा इसलिए क्योकि दिल्ली के वातावरण में प्रदूषण की मात्रा अधिक हो जाती हैं ।
अब आप सोच रहें होगें कि जब पूरी साल दिल्ली प्रदूषित रहती हैं तो दिवाली पर ज्यादा कैसे हो जाती हैं । इसका सीधा कारण हमारे द्वारा चलायें जा रहें अधां-धुंध पटाखों की वजह से होता हैं ।
अब आप कहँ सकतें हैं कि एक दिन पटाखे चलाने से भला क्या हो सकता हैं ?
यह बिल्कुल उसी तरह हैं जैसे किसी दमा के रोगी को उपचार की जगह गला घोटकर खत्म कर देना ।

पुरानी मूर्तियों से बनें लक्ष्मी

गणेश को न फेकें

प्रत्येक साल हम पूरे घर की सफाई करतें हैं. पुरानी व बेकार चीजों को घर से बाहर फेक देतें हैं. सफाई करना अच्छी बात हैं और बेकार चीजों को सही तरह से Destroy करना हमारी जिम्मेदारीलेकिन हम पुरानी चीजों में अपनें देवी-देवताओं की मूर्तियों को भी शामिल कर लेते और उन्हें अन्य कबाड़े के समान ही फेक देते हैं.
आप स्वंय से प्रश्न करें क्या ईश्वर एक बर्ष पश्चात बेकार हो सकते हैं ?
हर साल बदलने की जगह किसी भी धातु की मूर्ति खरीद कर ईस्वर को स्थाई रखियें.

घर में अलग पूजा करने की प्रथा को बदलें

यह बहुत आसान हो गया हैं कि आपने कहीं कोई घर बनाया और ईश्वर की स्थापना कर दी. “घर किसी ईटपत्थर या चीजों से नहीं बनता. ईटपत्थर से तो इमारत बनती हैं. घर तो घर में रह रहें लोगों से बनता हैं. जिसके हर कौने में बसे होते हैं आपके पूर्वजों के अरमान.”
सयुक्त परिवारों को एक साथ रह पाना मुश्किल हो गया हैं. लेकिन आप त्यौहारों पर तो पूरा परिवार मिलकर पूजा एक साथ कर सकते हैं. पितृ श्राद्ध करने से अच्छा हैं कि आप लोग जीते जी एक-दुसरें की देखरेख करें. उनका सम्मान करें…इन त्यौहारों का उद्देश्य भी यहीं होता हैं कि हमसब एक साथ मिलकर रहें.
दोस्तों, मैं उम्मीद करता हूँ कि आपको हमारी Diwali special पाँस्ट पसंद आई होगी. हमें कमेंट करकें अपने विचार हम तक जरूर पहुँचायें. यदि आपके पास भी कोई ऐसी कहानी हैं जो लोगों के लिए प्रेरणा का कारण बन सकती हैं तो आप हमें हमारी मेल आई ड़ी Merajazbaamail@gmail.Com पर लिख कर भेज सकतें हैं. हम आपकी स्टोरी MJC के सभी पाठको तक जरूर पहुँचायेगें. 

धन्यवाद

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