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पुस्तक समीक्षा : डार्क हॅर्स – Book Reviews in Hindi

डार्क हॅर्स – Book Reviews in Hindi

दोस्तों, आपने पुस्तके तो बहुत पढ़ी होगी. सबको पुस्तके पढ़ना भी बहुत अच्छा लगता हैं. जितने भी बड़े-बड़े बिलेनियर हैं वो खुद को मोटीवेट तथा नये इनोवेशन के लिए पुस्तको को पढ़ते हैं. यह पुस्तक खासकर युवाओं को क्यों पढ़नी चाहिए ? इसका अंदाजा आपको पुस्तक की भूमिका तथा Review को पढ़कर मालूम चलेगा.
तो चलिए शुरू करते हैं :- 
“संभवत: जिस उम्र में आदमी के पास सबसे अधिक ऊर्जा रहती हैं, कुछ करने का पुरजोर उत्साह होता हैं और दुनिया को देखने-समझने की सबसे ज्यादा जिज्ञासा होती हैं, मैने अपने जीवन का वह सबसे चमकदार दौर आईएएस की तैयारी के लिए मुखर्जीनगर में गुजार दिया. लिहाजा, यह तो तय था कि मैनें यहाँ की दुनिया, तैयारी के ताने-बाने, यहाँ की जिंदगी को नजदीक से देखा और बड़ी बारीकी से समझने की कोशिश भी की. शायद यही कारण रहा होगा कि मैनें अपने पहले उपन्यास में यहीं की जिंदगी को पन्नों पर उतारना सही समझा.
मैं किसी और के कहने से पहले अपनी ओर से ही ये दावा करता हूँ कि मैंने इस उपन्यास के रूप में कोई साहित्य नहीं रचा हैं, बल्कि सच कहता हूँ कि मैंने तो साहित्य सराहना और आलोचना से मुक्त, अनुभव से सुना, उसे ही गूँथकर एक कहानी बुन डाली हैं. एक ऐसी जमात की कहानी, जिनके साकार सपनों की चमक तो सब देखते हैं और उनके लिए प्रशस्तियाँ लिखी जाती हैं, कितने दरिया पार होते हैं, कितने पाताल धँसते हैं और कितने रेगिस्तान भटकते हैं, इस पर अब तक बहुत कुछ लिखा जाना बाकी था. मैंने बस वहीं सच लिखा हैं. “
डार्क हॉर्स नीलोत्पल मृणाल की पहली कृति और पहला उपन्यास है.  नीलोत्पल मृणाल सृजनाशीलता की बेचैनी को कागज पर उड़ेलते दिखते हैं. यह पीढ़ी खम ठोंक रही है कि हिंदी अब मठाधीशों की जागीर नहीं है और इसलिए लोग बिना आलोचकों की परवाह किए, मनमर्जी का लिख रहे हैं और छप रहे हैं. यह साहित्य के लोकतांत्रिकरण का दौर है.
अपनी भूमिका में ही मृणाल लिखते हैं कि उन्होंने उपन्यास के रूप में कोई साहित्य नहीं रचा है. इस उपन्यास को शैली या कथ्य के लिहाज से परखा नहीं जा सकता. कई दफा पढ़ते हुए आपको इसमें मौजूदा धारा के बनारस केंद्रित आधा दर्जन उपन्यासों की झलक दिखेगी, संवादों में क्षितिज रॉय के उपन्यास गंदी बात  का अक्स दिखेगा. पर अगर आपने या आपके परिवार में किसी ने कभी पटना, इलाहाबाद, दिल्ली के नॉर्थ या साउथ कैंपस में विजयनगर, मुखर्जी नगर और कटवारिया सराय में कभी सिविल सेवा की तैयारी की होगी, तो यह उपन्यास एक दफा आपको जरूर पढ़ना चाहिए.
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उपन्यास के 95 फीसदी पन्नों में अभ्यर्थियों के नाकामियों का दास्तान है. और नायक के, यानी डार्क हॉर्स की लंतरानियों का भी. पर उसके संघर्ष को बिना दिखाए डेढ़ पैराग्राफ में निपटाकर मृणाल ने सीधे उसे सफल घोषित कर दिया.
पर, सिविल सेवा अभ्यर्थियों के मानसिकता और मनोविज्ञान को मृणाल ने करीने से पकड़ा है. उपन्यास में एक संवाद है, ‘जेतना दिन में लोग एमए-पीएचडी करेगा, हौंक के पढ़ दिया तो ओतना दिन में तो आईएसे बन जाएगा.’ यह संवाद समझिए अभ्य़र्थियों के मनोविज्ञान को पकड़ता है, जो साल-दर-साल किस तरह तैयारियों में जुटे रहते हैं.
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डार्क हॉर्स’ का मुख्य किरदार संतोष बिहार के भागलपुर से सिविल सर्विस की तैयारी के लिए दिल्ली आता है। उत्तर प्रदेशबिहार जैसे हिंदी पट्टी के राज्यों से सिविल सर्विस की तैयारी करने के लिए लड़के या तो इलाहाबाद का रुख करते हैं या तो दिल्ली का। खास तौर से हिंदी माध्यम से तैयारी करने वाले लड़कों के लिए ये दो जगहें ही मख्सूस मानी जाती हैं। जो थोड़े कमजोर घर से होते हैंवे इलाहाबाद रह कर तैयारी करते हैंऔर जो थोड़े साधन-संपन्न होते हैंवे दिल्ली के मुखर्जी नगर में अपना आशियाना बनाते हैं।
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इस उपन्यास को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि नीलोत्पल ने हमें मुखर्जी नगर की एक इमारत की सबसे ऊपरी मंजिल की खिड़की पर बिठा दिया हैजहां से हम इसके सारे किरदारों को आतेजातेउठतेबैठतेपढ़तेलिखतेखातेपीते देख रहे होते हैं। सबकी जुबान पर पुरबिया बोली ऐसा माहौल पैदा करती है कि मानो बत्रा के पास पूरा का पूरा पुरबिस्तान इकट्ठा हो गया हो। यह भी नजर आता है कि बरसों से वैष्णव परंपरा का निबाह करते चले आ रहे छात्र दिल्ली में कदम रखते ही कैसे समझौतावादी हो जाते हैं और ‘गुरूत्व’ और ‘चेलत्व’ के भावों में उतरकर फौरन ही सोचने लगते हैं कि अब तो आईएएस की पोस्ट जरा दूर नहीं।
आज आप ऐसी पुस्तक की समीक्षा पढ़ने जा रहें हैं जो साहित्य के गलियारे घुमाते हुए आपके ज्ञान में एक अंक और अंकित करने का अवसर प्रदान करेगी.
        डार्क हॉर्स में अभ्यर्थियों के ऊंचे और खूबसूरत ख्वाब हैं, जिम्मेदारियों का जिक्र है. ठसक है. परिवार और गांव में अपनी इज्जतअफजाई और अगली कई पीढ़ियों का उद्धार कर देने का उत्साह है. मुखर्जी नगर को उकेरते हुए मृणाल एकदम ईमानदार तस्वीर पेश करते हैं. इसमें एक फिल्मी और बॉलीवुडीय नाटकीयता भी है. उसी नाटकीयता में गांव से आए चाचा भी हैं, जो दिल्ली दिखाने की जिद करते हैं. उसी में गरीबी भी है, गांव की बिकती हुई जमीन भी है. कई दफा हो जाने वाला नवयुवकीय प्रेम भी है.
वैसे, मृणाल की तारीफ इस बात में है कि उन्होंने अपने किरदारों को कॉलर पकड़ कर नहीं चलाया है. उनके पात्र जब जो चाहा, बोलते है. शायद इसलिए मृणाल अपनी रचना को साहित्य के दर्जे में नहीं रखते. हालांकि, साहित्य में शुचिता जैसी चीजें बेमानी हैं (चूँकि साहित्य समाज का दर्पण होता है) पर, किरदारों में विभिन्नता, उनके भावात्मक यात्रा में आरोह-अवरोह में वैविध्य की उम्मीद तो की ही जा सकती है.
कुल मिलाकर उपन्यास पठनीय तो है. मृणाल संभावनाएं जगाने वाले लेखक हैं, इसलिए दिलचस्प होगा कि वह अगली दफा कैसी कहानी लेकर आते हैं.
जितना उन्होंने लिखा है, उससे एक बात स्पष्ट है कि इनके पास कहने के लिए बहुत कुछ था. मसलन एग्ज़ाम क्लियर करने के बाद आनेवाले शादी के ऑफ़र और लड़कों के अपने प्रेम संबंध के चलते पैदा होने वाली दुविधा की स्थिति, जैसे परीक्षा पास करने वाले विमलेंदू के साथ होता है.
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संतोषरायसाहबमनोहर, गुरु, जावेद, विमलेंदू की यह कहानी एन्टरटेन्मेंट में कोई कसर नहीं छोड़ती. यदि आप दिल्ली होते हुए यूपी और बिहार के गांवों के मनोरंजक सफ़र पर चलना चाहते हैं तो इस डार्क हॉर्स पर अपना दांव लगा सकते हैं.
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धन्यवाद 🙂

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