जैसी मेहनत वैसा फल.. Inspirational Article in Hindi

'शालीन' और 'तेखू' दोनो दोस्त थे | दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे |  मगर दोनों की सोच तथा काम करने का तरीका एक दम अलग था | &...

'शालीन' और 'तेखू' दोनो दोस्त थे | दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे |  मगर दोनों की सोच तथा काम करने का तरीका एक दम अलग था | 'शालीन' हमेशा पढ़ने में तेज तथा कक्षा में  अच्छे नम्बरो से पास होता था | जबकि 'तेखू' average अंको से पास हो पाता था | 'शालीन' शान्त स्वभाव तथा कर्तव्य परायण लड़का था जबकि 'तेखू' हमेशा शैतानियों में लगा रहता था | अब आप सोच रहें होगें कि दोनों की दोस्ती हो कैसे गई और 'शालीन' आखिर साथ में  रहता क्यों था ?
तो इसका जबाव एक ही हैं , जैसे - चदंन के वृक्ष पर सर्प रहते हुए भी वह अपने गुणों को नहीं त्यागता और पूरे वन को सुगन्धित करता रहता हैं  ठीक उसी प्रकार कुछ कर्तव्य परायण लोग अपने गुणो से हमेशा समाज को महकाते रहतें हैं | उन पर कभी अराजक तत्वों का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता, बल्कि अपने positive thought से दुसरो को motivate होने के लिए प्रेरित करते रहते हैं |
 'शालीन' भी उन्हीं लोगों में से एक था | वह अपने दोस्त ' तेखू' को हमेशा समझाता रहता था | ताकि वह भी अपना जीवन सभांल सकें |
एक दिन उनके स्कूल में 'कलेक्टर' साहब  आये | उन्होने बच्चों को पढ़ाई से सम्बधित कुछ बाते बताई.......और  वो पढ़ाई से खुद व दुसरो का जीवन कैसे बदल सकतें हैं इसके बारे में भी बताया |
'शालीन' सारी बाते बड़ी गम्भीरता से सुन रहा था | वही 'तेखू' उबाईयॉ लेकर मन ही मन में सोच रहा था कि जल्दी यहॉ से छुट्टी मिले और वो मस्ती करें |


'कलेक्टर' साहब जाने से पहले बच्चों को बोले , "  मेरे प्यारे बच्चों, अगले 6 महिने के बाद पर्यावरण दिवस आने वाला हैं इसलिए आप लोग अपनी रूचि के अनुसार पौधें लगा सकते हैं | जो अच्छा काम करेगा हम उसे पुरस्कृत करेगें |"
'कलेक्टर' साहब अपना भाषण देकर चले गये | सभी बच्चे छुट्टी हुई वैसे ही वो भी अपने - अपने घर चले गये | मगर 'शालीन' वही खड़ा होकर सोचने लगा कि आखिर वह कौन सा पेड़ या पौधा लगाये जिससे लोगों का और पर्यावरण का फायदा हो ? आखिर में उसने अंगूर की बेल लगाने का फैसला लिया | वह अपने गाँव से पाँच किमी दूर तेज धूप में साइकिल से पेड़ - पौधों की नर्सरी में पहुँचा..... | अब उसने सिर्फ अगूंर की बेल की जगह कुछ पौधे और खरीद लिए.....जिनमें एक नीम, जामून, शीशम, यूकेलिप्टस और अंगूर की बेल थी | वह तुरन्त स्कूल पहुँचा और उसने सभी पौधों को लगा दिया | अगले दिन जब सभी विधार्थी और अध्यापक पहुँचे तो सभी आश्चर्य से एक दुसरे से पूँछने लगें , " कि ये पौधे किसने लगा दिये....... |" बाद में पता चला कि यह काम 'शालीन' ने किया हैं यह जानकर सभी उसकी तारीफ करने लगें | 
चूकि सभी को पौधा लगाने को बोला गया था इसलिए सभी ने कोई न कोई पौधा लाकर लगा दिये | मगर 'तेखू' ने अपना अलग ही दिमाक लगाया | उसने बरगद के पेड़ पर अमर बेल डाल दी | वह बहुत खुश था क्योकि सभी को  पौधों की रोज देख-रेख करनी पड़ती थी तथा पानी देना पडता था  | जबकि उसे न तो बेल को पानी देना था और ना ही किसी प्रकार की कोई सुरक्षा करनी पड़ती थी | कुछ महिनों बाद 'शालीन' के द्वारा लगाये पौधें काफी बड़े हो चुके थे | अंगूर की बेल फलने लगी थी वो धीरे-धीरे और पौधो पर भी चढ़ने लगी | उसकी छाया में कोई भी बैठ सकता था | मगर अमर बेल, नाम की तरह ही अपना साम्राज्य बढ़ाती जा रही थी | यह अमर बेल का अतिक्रमण था जो धीरे-धीरे वृक्ष की आजादी को छीन रही थी....न कोई फल की उम्मीद...... और ना ही किसी जीव के लिए भोजन दे सकती थी...... | 
अब पूरे 6 महिने हो चुके थे | पर्यावरण  दिवस का दिन था | 'कलेक्टर' साहब भी अपने किये वादे के अनुसार आ गये थे | उन्होनें एक - एक करके सभी का काम देखा......तो पाया कि जिन बच्चो ने पेड़-पौधों की देख-रेख में ध्यान दिया हैं  उनके द्वारा लगाये गये पौधें लहरा रहे हैं | जबकि जिन्होनें पौधें लगाने के बाद ज्यादा ध्यान नहीं दिया उनके पौधे या तो सुख गये थे या फिर किसी जानवर द्वारा खा लिए गये थे ......तथा कुछ रोग लगने के कारण नहीं हो पाये |
जैसे ही 'कलेक्टर' साहब की नजर 'शालीन' के द्वारा लगाये पौधों पर पहुँची तो वह देखकर खुश हो गयें ......पाँचों पौधें हरे-भरे तथा वह नित्य बढ़ रहें थे | सबसे अच्छी बात तो यह थी कि 'शालीन' के द्वारा लगाई अंगूर की बेल पर अंगूर के गुच्छे लदे हुए थे | जब 'कलेक्टर' साहब ने उनका स्वाद चखा तो उन्होनें 'शालीन' की काफी तारीफ की |
 'शालीन' ने रोज मेहनत की थी .....उसने पौधों के लिए काँटे, रस्सी और लकड़ीयों से सुरक्षित करके उन्हें बड़ा किया था | 
'शालीन' की मेहनत के लिए 'कलेक्टर' साहब ने उसे पुरस्कृत किया | और सभी बच्चों को 'शालीन' से सीख लेने की सलाह दी | 
यह सब देखकर 'तेखू' को अपने कार्य पर बहुत अवशोष हुआ | अब वह समझ चुका था कि बिना मेहनत के कोई भी व्यक्ति अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच सकता |



दोस्तों, हम में से भी बहुत से लोग आराम की जिदंगी जीना चाहतें हैं | मगर साथ में  यह भूल जातें हैं कि आप आराम का असली आनंद तो मेहनत करने के बाद ही हासिल कर पाएंगें | जब बात मेहनत करने की आती हैं तो हम शाँर्ट-कट का रास्ता अपनाने लगते हैं | जो आपको कभी सफल नहीं होने देगा |

                                          
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