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दोस्तो, ' आपने वो कहावत तो जरूर सुनी होगी, ' बगुला चले हंस की चाल |'  यह कहावत, ' मैं इसलिए याद दिला रहा हूँ कि जब बगुला हं...

दोस्तो, ' आपने वो कहावत तो जरूर सुनी होगी, ' बगुला चले हंस की चाल |' 
यह कहावत, ' मैं इसलिए याद दिला रहा हूँ कि जब बगुला हंस की चाल चलता हैं तो उसे अपने आप पर बहुत गुमान होता हैं , लेकिन जब दूध में से पानी अलग करके केवल दूध पीने की कौशल कला को परखने की बारी आती है तो बगुला यहॉ फेल हो जाता हैं | 
ठीक इसी प्रकार हम लोग भी बुद्धिमता का मुखोटा पहनकर अपने ज्ञान का बखान करते फिर रहे हैं | 
किसी को पैसों से खरीदकर बनाये गये डिगरियों के पहाड़ पर ऐवरेस्ट फतेह करने जैसा अहसास तो हो सकता हैं मगर उन्हें यह कौन समझायें ? ' कि ऐवरेस्ट रूपी डिगरियॉ पर हेलीकॉप्टर रूपी सुविधाओं से लेण्डिग करना कोई विजयी या बधाई का धोतक नहीं हैं |  हकीकत में मेहनत का एक-एक पग बड़ी धैर्यता के साथ रखकर अन्त तक शालीनता, सुदृढता तथा सय्यमता के साथ जोड़े गये अनुभवों के पन्नो से चढ़ा जाता हैं | जिन पर लिखी जाती हैं आपकी सफलता की कहानी, जो खुद-बखुद  लोगों की जुबा पर बढ़- चढकर कायनात की हवा में गुजती हैं |



 Stardom हमारी बढ़ती महत्वकांक्षाओ तथा कमजोर skills के बीच के फर्क को कभी पहचानने का अवसर नहीं देता..... कभी फुर्सत में, जब स्याह काली रात हो या फिर, 'आप और केवल आप' हो एकांत में, 'वहॉ मुलाकात कीजिए अपने आप से.......तब आपको घोर अधेरे में भी बिना किसी दर्पण के आपके स्वंय का साक्षात्कार होगा |
         
कुछ लोग जन्म - जाति, विधियों, परमपराओं में खुद को ऐसे जकड़ लेते हैं जैसें - मकड़ी स्वंय के बनाये जाल में खुद को फास लेती हैं | 
वो छोटा काम इसलिए नहीं करना चाहते क्योकि उनके stardom को शोभा नहीं देता... बड़ा काम इसलिए नहीं कर सकते क्योकि उनके पास न तो सोच हैं और ना आर्थिक source हैं........ऐसे में नियति आपके stardom का ऐसा drum  बजाएगी की, ' आप ना घर के रहेगें ना घाट के |'
तो क्या करें ?..............
"जब जिदंगी जलेबी की तरह उलझ ही गई हो तो क्यो न चासनी में डूबकर जिदंगी का मजा लिया जाए |"
आइए इस कहानी के माध्यम से अपनी ताकत का आकलन करें | थोड़ा और करीब से जाने अपने वातावरण को.......
         
एक गाँव की बात हैं | जहॉ दो बच्चे अपने गाँव से दूर खेलने के लिए निकल गये | एक बच्चा हल्का पतले शरीर का था जबकि दूसरा भारी मोटे शरीर का था......चूकि दोनों की उम्र लगभग नौ- दस साल की थी इसलिए गाँव के जगंल और जगह के बारे में इतनी जानकारी नहीं थी | भारी वजन वाला लड़का उस कुँए से अजांन उसकी तरफ दौड़ता चला आ रहा था ........अचानक,'कुँए को देखकर , ' वो खुद को सभांल पाता कि इससे पहले वो उस कुँए में जा गिरा | '
पतला वाला लड़का उसको गिरता देख उसकी तरफ और तेजी से बचाने को भागा, ' तो जाकर देखा कि उसका दोस्त कुँए में रो रहा हैं | कुँए की गहराई ज्यादा हैं और वह अपने सारे कपड़े उतारकर रस्सी बनाये तो भी वह वहाँ तक नहीं पहुँचा पाएगा | ऐसे में वह क्या करे ?'....उसका दिमाक उस समय यह निर्णय सैकेड़ो में ले रहा था | वह वहॉ इधर-उधर बिना समय गवायें रस्सी के लिए दौड़-भाग करने लगा | मगर उसके हाथ अब भी खाली थे....वह और तेज दिमाक दौड़ाने लगा....तभी उसे वहॉ एक मजबूत बेल दिखाई दी | उसने उस बेल को एक पत्थर की मदद से काटा और उस कुँए में बेल का एक छोर डाल दिया तथा दुसरे छोर को पकड़कर उसने उस लड़के को मजबूती से पकड़ने के लिए जोर से आवाज दी....तथा पूरी ताकत से वह खीचने लगा , मगर भारी शरीर होने के कारण वह उसको खीच पाने में असमर्थ था | उसने मोटे लड़के को आवाज दी, ' तुम ऊपर आने के लिए कुँए में बनी दरारों का सहारा लो ताकि मुझे साहयता हो सकें |'
अगली बार वह पतला लड़का पुन: कोशिश में  जुट गया | इस बार की कोशिश रंग लायी और वह कुँए से बाहर निकल आया | 


दोनों लोग जब गॉव में पहुँचकर अपनी पूरी कहानी बतायें तो कोई मानने को तैयार नहीं हुआ | सभी बच्चा समझकर हँसी मान रहे थे |  कुछ घटों बाद जब मोटे लड़के का पाँव सूजना शुरू हुआ तो सब को यह विश्वास हो गया कि वास्तव में, ' वह बच्चा सच कह रहा था
 |'
अब सब के मन मे एक ही सवाल था कि इस पतले-दुबले लड़के ने आखिर अपने से दुगने वजन वाले लड़के को खीच कैसे लिया..... ?
          
सभी लोग अपने सवाल का जवाब लेने के लिए गाँव के सरपंच के पास पहुँचे | 
सरपंच ने सबकी बात सुनी....थोड़ी देर शांत रहे फिर बोले , " वह पतले-दुबले शरीर का बच्चा अपने से दुगने शरीर के बच्चे को इसलिए निकाल पाया क्योकि उसके पास यह बताने वाला कोई नहीं था कि , ' तू यह नहीं कर सकता '....और वह पूरे जी जान से उसे निकालने में अपनी पूरी ताकत का इस्तेमाल कर पाया |
ठीक इसी प्रकार हम लोग भी अपनी पूरी ताकत को झोके बिना ही निर्णय ले लेते हैं कि यह काम तो हम से हो ही नहीं सकता | 


MeraJazbaa.com का मकसद ही यही हैं कि लोगों के अदंर जज्बा पैदा किया जाए | वह रूढीवादी की जिदंगी न जीकर रहें | उनके अदंर का जज्बा ही उनकी असली पहचान बने....और यह तभी सभंव होगा जब हमारी नीति, नियति और नेतृत्व का सही प्रयोग होगा |
                                                                                                                                    धन्यवाद :)

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