साधू की तीन बातें - Inspirational Story in Hindi

साधू की तीन बातें जो हमारे अन्दर परोपकार की भावना जगाती है... जगंल में रोज की तरह आज भी लकड़हारे ने लकड़ी काटकर एक गठ्टर बांध लिया था मगर ...

साधू की तीन बातें जो हमारे अन्दर परोपकार की भावना जगाती है...
जगंल में रोज की तरह आज भी लकड़हारे ने लकड़ी काटकर एक गठ्टर बांध लिया था मगर काफी देर इतंज़ार करने के बाद भी कोई आता दिखाई नही दिया,  जिससे वह मदद ले सकें तो वह जुझलाते हुए भगवान के बारे में  बुरा - भला कहने लगा | वो काफी देर इतंज़ार करते - करते वही लेट गया .......लेटे - लेटे उसकी आँख लग गई~~~ जब उसकी आँख खुली तो उसने देखा, एक साधु उसके सामनें खड़े हुए हैं |



लकड़हारा बोला, " बाबा, आप कब से यहॉ पर खड़े हैं ?
साधु मुस्करातें हुए बोले, " मैं तो हमेशा ही यहां पर रहता हूँ |
पर मैं यहां पर रोज आता हूँ मैनें तो आपको कभी नहीं देखा, और जब आप यहॉ पर थे तो आप मेरी मदद करने क्यों नहीं आये ? , " लकड़हारे ने पूछा |
साधू बोले - मनुष्य की यहीं समस्या हैं कि हजार सुखों को बिना किसी को बतायें अकेले भोगना पसंद करते हैं....और जरा सी परेशानी आने पर तुरन्त भगवान को दोष देने लगते हैं |
मैं तुम्हरी मदद कैसे करता क्योकि तब मैं ध्यान में था और जैसे ही ध्यान से निव्रत हुआ, चला आया तुम्हारे पास.... | मगर तुम गहरी नींद में थे इसलिए मैंनें सोचा कि तुम्हें कच्ची नींद में उठाना ठीक नहीं |
साधू की बाते सुनकर बाबा के प्रति लकड़हारे के मन में भावनात्मक जुड़ाव महसूस हुआ |
लकड़हारा दोनो हाथ जोड़ते हुए बोला , " बाबा, मैं बहुत परेशान हूँ ...मेरे छोटे- छोटे दो बच्चे हैं....मैं उनका लालन- पालन ठीक से नहीं कर पा रहा हूँ | आप मुझे कोई ऐसा मंत्र बतायें जिससे सारे सकंट दूर हो जाएं |
साधू बोले , " यह सब सम्भव हैं पर तुम्हे पहले मुझे वचन देना होगा कि जो चीजे मैं तुम से मागूगां वो तुम मुझे रोज दोगें |
यह सुनकर लकड़हारे के पैरो से जमीन खिसक गई | वो सोच में पड़ गया........और सोचने लगा कि मेरे पास तो खाने के लिए कुछ भी नहीं हैं ......मैं भला क्या दें पाऊगां .....? हॉ पत्नी का मगंल सूत्र हैं ......मगर वो भी एक बार देने के बाद दुबारा कहॉ से लाऊगां ?

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यह सब सोच ही रहा था | तभी साधू पुन: बोले , " तुम ज्यादा मत सोचो , बस हॉ बोलो |"

मगर मेरे पास तो ऐसा कुछ भी नहीं हैं जो मैं रोज आपको दें सकू , "सिर नीचे झुकाते हुए लकड़हारा बोला |"

साधू ने मुस्कराते हुए कहॉ , " हर इसांन के पास ये तीन चीजे हमेशा होती हैं  अपने अवचेतन मन को जगायें रखकर इनका नित्य इस्तेमाल करतें हैं वो नई ऊचाईयों को हांसिल करतें हैं और जो अवचेतन मन की शक्ती को महसूस नहीं करते वह अपनी अकाक्षाओं को कभी पूरा नहीं कर पाते और हमेशा वह परेशान रहते हैं |
जो मैं तीन चीजे बताने जा रहा हूँ अगर तुम उन पर अमल करोगें तो तुम भी सफलता प्राप्त करोगें | और वो हैं -

1 - मुस्कान :-
     
हँसना भी एक कला हैं | यह इतना आसान काम होते हुए भी 90% लोग बड़ी मुश्किल feel करते हैं | जब आप मुस्कराते हैं तो सामने वाला भी मुस्कराता हैं जिससे आपकी मुलाकात में मधुरता आती हैं |
हँसने से आप एक तीर से दो निशाने लगा सकते हैं | हँसते हुए आप सच और शिकायत दोनो की क्षमता बढ़ाते हैं |
हँसना शारीरिक, मानसिक तथा व्यवहारिक तीनों स्तर पर ठीक होता हैं |
बड़े लोग सुबह उठते ही ईश्वर को धन्यवाद देते हैं कि उन्होनें एक और जिदंगी के लिए नई सुबह देदी |और अपने दिन की शुरूआत मुस्कान के साथ करते हैं | 
जबकि बाकि लोग दिन शुरू होते ही न तो किसी को धन्यवाद देते हैं और ना ही अपने काम को लेकर खुश रहते हैं | नई सुबह इनके लिए कोई नई बात नहीं होती यह तो उनके अधिकार की बात हैं | इसमें धन्यवाद जैसी कोई बात नज़र नहीं आती ......ऐसे लोग हमेशा भय/भ्रम में जीते हैं |

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2 - वाकपटुता :-
    
आपके बोलने-चालने से ही लोग आपसे जुड़ते हैं | बोलते समय शब्दो का चुनाव बड़े ही सोच समझकर करना चाहिए | क्योकि शब्दों की वजह से ही इसांन गले में उतर जाता हैं या गले से उतर जाता हैं | हम चहरे कि मुस्कान के साथ उचित शब्दो का चुनाव भी सही तरीके से करते हैं  तो सामने वाला हमारी तारीफ किये बिना नहीं रह सकता | हम किसी की बुराई तो बड़-चढ़कर करते हैं क्योकि तब हमें खुशी का अहसास होता हैं | अगर आप दुसरो की तारीफ करना शुरू कर देगें तो आपकी आत्मा को सच्ची खुशी मिलेगी और हो सकता हैं कि लोग आपके पीठ पीछे भी तारीफ करें |
कबीर दास जी ने कहां हैं -

"ऐसी वाणी बोलिएं, मन का आपा खोयें |
ओरन को शीतल करें, आपहु शीतल होयें ||"

अर्थात -  वाणी में ऐसी ताकत होती हैं , जो मधुर बोलकर अपरचित व्यक्ति को भी अपना बनाया जा सकता हैं तथा कड़वा बोलने से अपने भी परायें हो जातें हैं |  वाणी में ऐसी ताकत होती हैं , जो हमें बिना छाया के भी शीतलता का अहसास कराती हैं |
     एक बच्ची जब अपने पिताजीं के साथ बाजार जाती थी तो वह हमेशा सामान खरीदनें के पश्चात धन्यवाद शब्द से अभिवादन करती थी | यह उसकी अच्छी आदत का ही नतीजा था कि वह कभी- कभी लोगो से प्यार में बिना पैसों के टॉफी, खिलौनें आदि चीजें ले लेती थीं | और जब वह बिमार हो जाती तो लोग उसके जल्दी ठीक होने की कामना करतें थें |
एक छोटी सी आदत की वजह से उस बच्ची के चारों ओर प्यारा सा संसार बन गया था |

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3 - सहायता :-

यह जरूरी नहीं कि आपके पास पैसे होगें तभी लोग आपका काम करेगें | आप लोगों की सच्ची तारीफ तो करके देखिएं | वो दुगने जोश के साथ आपका काम करने के लिए तैयार हैं | आप भी अपने काम का हिस्सा बना सकते हैं दुसरो की सहायता करके |
तुलसीदास जी ने कहां हैं -
' परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधभाई।’
जिसका अर्थ है- दूसरों का भला करना सबसे महान धर्म है और दूसरों को दुख देना महा पाप है। अतः हमें हमेशा परोपकार करते रहना चाहिए। यही एक मनुष्य का परम कर्तव्य है।
         अगर आप किसी का भला करने में असहज महसूस करतें हैं या फिर आपके अहम को ठेस पहुंचती हैं तो कृपा करके किसी का बुरा भी मत करियें |
कबीरदास जी ने कहॉ हैं -

"बुरा जो देखन में चला, बुरा न मिलया कोय |
जो दिल खोजा आपनो, मुझसा बुरा न कोय ||"

अर्थात - हर व्यक्ति का यही सबसे बड़ा दोष हैं कि वो ससांर में खामियॉ ढुढ़ता हैं मगर खुद में शायद कभी नहीं | कबीर दास जी ने आगे कहाँ हैं कि जब मैनें खुद के अदंर झाका तब समझ आया कि जब अपना चश्मा गंदा हो तो सामने भी गंदा ही दिखाई देगा | जब तक आप अपनी एक भी बुराई को बड़ा समझकर उसे खतम नहीं कर देते तब तक आप को किसी दुसरे की बुराई को चिन्हित करने का कोई अधिकार नहीं हो सकता |
      साधू की तीनो बातें समझकर लकड़हारा अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रहा था | उसे समझ आ गया था कि वह बिना ज्ञान के कितने अधेरे में था | उसने यह तय किया कि वह अपनी गलतियों के लिए कभी किसी दुसरें को दोष नहीं देगा | कुछ समय बाद लकड़हारें ने बाजार में जाकर लकड़ीयो को बेचना शुरू कर दिया | धीरे - धीरे उसका काम बढ़ने लगा और वह सुखी सम्पन्न ज़िदंगी जीने लगा |
     हम में से कई लोग उस लकड़हारे की पुरानी ज़िदंगी की तरह जी रहें हैं | जो नित्य दोष दे रहें दुसरों को......कोश रहें हैं अपने भाग्य को .....तथा जल रहे हैं ओरों की कामयाबी सें |
यह कभी न ठीक होने वाली बिमारी हैं जब तक सकारात्मक परिवर्तन वाली सोच की दवा न दी जाएं |
नोट - अपने आस - पास सफाई बनायें रखें | यह भी परोपकार हैं |

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